क्या आप जानते हैं यह हमास है क्या
अभी पूरी दुनिया एवं सभी न्यूज चैनलों पर इजराइल और हmaस के युद्ध की चर्चा है.
और, अपने भारत में भी राष्ट्रवादी खेमा इस पर जोर शोर से चर्चा कर रहा है.
असल में हमास एक आतं कवादी संगठन है जो इजराइल से सटी मिस्र एवं गाजा पट्टी में सक्रिय है जिसकी स्थापना 1987 में अहमद यासन और अब्देल अजीज अल रंतीसी ने बनाया था.
इसका उद्देश्य एजिप्ट के मुसरिम ब्रदरहुड का सहयोग करना था.
ब्रदरहुड मतलब कि.... इसे मिस्र तथा फिलिस्तीन के कटेशरों ने मिलकर बनाया था जिसका उद्धेश्य क्षेत्र में इजरायली प्रशासन के स्थान पर पिस्लामिक शासन की स्थापना करनी थी.
इसमें ये ध्यान रखने की जरूरत है कि इजराइल की स्थापना 14 मई 1948 को हो गई थी...
लेकिन, ये संगठन बना 1987 में.
तो, क्या इन 40 वर्षों तक इजराइल चैन से जीवन जीता रहा ???
ऐसा नहीं है...
बल्कि, 1987 से पहले इजराइल को नेस्तनाबूत करने की जिम्मेवारी फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन (PLO) ने उठा रखी थी और उसके नेता का नाम यासिर अराफात था.
लेकिन, उसका सिर्फ नाम ही अराफात था जबकि असलियत में वो सबसे बड़ा खुराफात था.
फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन को अपने समय का सबसे बड़ा आतं कवादी संगठन माना जाता था... जो कि दुनिया का सबसे खतर नाक संगठन माना जाता था.
दूसरे नंबर पर श्रीलंका की LTTE आती थी क्योंकि इसके लोग अपने गले में साइनाइड की कैप्सूल लटका कर रखते थे ताकि अगर पुलिस इन्हें पकड़ने की कोशिश करे तो ये वो कैप्सूल चबा कर मर जाएँ.
खैर... अराफात जो था सो था... लेकिन, आप यह जानकर हैरान हो जाएंगे कि वो अपने देश की तथाकथित आयरन लेडी को अपनी बहन मानता था.
और, उसके बाद उसके पायलट बेटे को भी अपना भांजा ही मानता था.
हद तो ये रही कि.... जब आतंकवादी यासिर अराफात ने इज़राइल के विरोध में फिलिस्तीन को एक मुसरिम राष्ट्र घोषित किया तो फिलिस्तीन को मान्यता देने वाला पहला देश... कोई सऊदी अरब, पिग्गिस्तान, अफगानिस्तान, इराक, मिस्र या तुर्की नहीं बल्कि उसी तथाकथित आयरन लेडी लीड भारत था.
सिर्फ इतना ही नहीं.... बल्कि, उसने तो यासिर अराफात जैसे आतंक वादी को "नेहरू शांति पुरस्कार" तक दे दिया.
और, उसके औलाद अर्थात पपुआ के बाप ने तो उसे "इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय शांति पुरस्कार" तक पकड़ा दिया.
सिर्फ इतना तक भी रहता तो गनीमत था.
लेकिन, इस पपुआ के बाप ने तो एक कदम आगे बढ़ते हुए उसे दुनिया भर में घूमने के लिए एक बोइंग विमान तक उपहार में दे दी.
अरे हाँ.... उस माँ-बेटे के इतने दरियादिली के बदले उस अराफात ने आजीवन OIC (इस्लामिक देशों के संगठन) में कश्मीर को "पिगिस्तान का अभिन्न अंग" बताता रहा.
साथ ही उसका कहना था कि.... जब भी पिगिस्तान चाहेगा तो मेरे बच्चे कश्मीर की आज़ादी के लिए लड़ेंगे.
अरे हाँ.... इन सबके बीच तो ये बताना भूल ही गया था कि इजराइल के गठन के समय अल्बर्ट आइंस्टाइन के सहयोग हेतु निवेदन के बाद भी अपने निहारु चाचा ने इसका पुरजोर विरोध किया था..!
लेकिन, फिर भी इजराइल बना.
परंतु... मुसरिम प्रेम के कारण निहारु-गांडी फैमिली ने अगले 40-50 सालों तक उससे कोई रिश्ता नहीं रखा. (इजराइल से हमारा राजनैतिक संबंध 1992 में जाकर स्थापित हुआ).
और तो और.... राजनैतिक सम्बंध होने के बाद भी अगले 70 सालों तक किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री ने इजराइल यात्रा की जरूरत महसूस नहीं की.
इन सब तथ्यों से ये समझना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है कि क्यों नरेंद्र मोदी से पहले भारत को एक सॉफ्ट एवं डरपोक देश माना जाता था.
क्योंकि, बात बहुत ही सिंपल है कि जब आप खुद ही एक आतं कवादी संगठन को मान्यता दोगे... उसके हेड को देश में पुरस्कारों से नवाजोगे...
तो फिर किस मुँह से खुद को आतंक वाद से पीड़ित बता पाओगे ?
लेकिन, इन सब तथ्यों के आलोक में ये समझना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है कि खांग्रेस राज में हमारे देश का स्टैंड क्या रहता था.
और, किस कारण दुनिया में हमारी कोई वैल्यू नहीं थी.
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